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Thursday, April 22, 2010

भूखी रातो का सफ़र

बारिश थमने के साथ औरतें जुटने लगी हैं। फिर वे उस बेहद कठिन सबक के बारे में बात करने लगती हैं, जो उन्हें अपने बच्चों को सिखाना होता है। और यह सबक है कि भूखे कैसे सोया जाए। वे कहती हैं, ‘यदि हमारे पास थोड़ा भी खाना होता है तो हम उसे बच्चों को दे देते हैं। थोड़ा और खाना होने पर वह मर्दो की खुराक बन जाता है। औरतों को भूखे रहने की आदत होती है।’




पूर्वी उत्तरप्रदेश की एक निर्धन देहाती बस्ती में शाम गहरा रही है। बारिश से बचने के लिए हम एक छोटे से घर में शरण लेते हैं। फूस की टपकती छत के नीचे मिट्टी की ऊबड़-खाबड़ सतह पर झुंड में बैठी मुसहर औरतें बतिया रही हैं। वे बात कर रही हैं जमीन, रोजगार, भोजन और किसी उम्मीद के बिना जिंदगी की कठिनाइयों से जूझने के अलग-अलग रास्तों के बारे में। बारिश थमने के साथ ही और औरतें जुटने लगी हैं।




अब उनकी बातें बच्चों और उनकी परवरिश पर केंद्रित हो जाती हैं। और फिर वे उस बेहद कठिन सबक के बारे में बात करने लगती हैं, जो उन्हें अपने बच्चों को सिखाना होता है। और यह सबक है कि भूखे कैसे सोया जाए। ‘हफ्ते में आधा दिन हमें सब्जी या दाल के साथ रोटी या चावल नसीब होते हैं।




बाकी दिन केवल रोटी या नमक-हल्दी वाले उबले चावल के साथ काटने होते हैं। लेकिन महीने में चार या पांच दिन ऐसे होते हैं, जब हमारे पास खाने को कुछ नहीं होता। तब हमारे पास फाका करने के सिवा और कोई चारा नहीं होता। यदि हमारे पास थोड़ा भी खाना होता है तो हम उसे बच्चों को दे देते हैं। थोड़ा और खाना होने पर वह मर्दो की खुराक बन जाता है। औरतों को भूखे रहने की आदत होती है।’




महीने के उन उजड़े दिनों में, जब घर में न अन्न का एक दाना होता है और न करने को कोई काम, तब समूचा कुनबा खाने की तलाश में निकल पड़ता है। यदि नसीब ने साथ दिया तो दिन भर की तलाश के बाद मुट्ठी भर अनाज तो हासिल हो ही जाता है। इसे एक बड़े से बर्तन में उबाला जाता है ताकि ज्यादा का भ्रम पैदा किया जा सके।




लेकिन बच्चों के पेट अब भी खाली हैं और वे भोजन के लिए बेचैन हो रहे हैं। ‘हम उनके आंसू नहीं देख सकतीं,’ औरतें अपनी बात जारी रखती हैं। ‘जब बच्चों की तकलीफ बर्दाश्त के बाहर हो जाती है, तब हम तंबाकू मसलकर उन्हें अपनी अंगुलियां चूसने को दे देती हैं। इससे वे बिना कुछ खाए-पिए भी सो जाया करते हैं।




यदि बच्चे छोटे हों तो हमें उन्हें तब तक पीटना पड़ता है, जब तक वे रोते-रोते न सो जाएं। लेकिन बच्चों के बड़े होने पर हम उन्हें भूख के साथ जीना सिखाने की कोशिश करते हैं। यह एक ऐसा सबक है, जो जिंदगी भर उनके काम आएगा। क्योंकि हमें पता है कि भूख जीवन भर उन्हें सताने वाली है।’




जिन लोगों के लिए भूख जिंदगी की एक क्रूर सच्चाई है, उनसे बातचीत कर हम जैसे लोग उनकी स्थिति को थोड़ा समझ सकते हैं। उन लोगों से हुई इस बातचीत ने मुझे लगातार व्यग्र किया है। मैं बार-बार अपने कॉलम में इस विषय पर लिखता रहूंगा, ताकि आपको भी अपने साथ शामिल कर सकूं।




ओडीसा का एक बुजुर्ग विधुर अरखित दिन में एक दफे भात पका पाता है और वह भी तब, जब उसमें ऐसा कर सकने की ताकत बच पाती हो। यदि ऐसा न हो तो वह केवल काली चाय उबालकर पी लेता है और सो जाता है। आंध्रप्रदेश के एक बूढ़े सोमैया की दिनचर्या भोजन की तलाश करने तक सीमित है।




कभी-कभी उसके पड़ोसी उसे उबले हुए भात के साथ खाने को पतली दाल दे देते हैं। कई बूढ़े ऐसे भी हैं, जो गांव के सरकारी स्कूल में जाकर मध्याह्न् भोजन की दाल या सांभर की भीख मांगते हैं। एक बूढ़ी बेवा मालती बरिहा की पहुंच से मसाले बाहर हैं, लिहाजा वह चावल के साथ सालन नहीं खा पाती। अक्सर उसमें इतनी ताकत भी नहीं बची रह जाती कि वह ईंधन के लिए लकड़ियां जुटा सके। ऐसे मौकों पर उसे अधपके भात और आलू से ही काम चलाना होता है।




अंतम्मा बहुत पहले ही विधवा हो गई थी और उम्र बढ़ने पर बच्चों ने भी उसे छोड़ दिया। वह स्वीकारती है कि दिन के अधिकांश समय उसका ध्यान अगले जून की रोटी का जुगाड़ करने पर ही केंद्रित रहता है। अक्सर वो सोचती है कि भीख मांगना शुरू कर दे, लेकिन पड़ोसियों की कानाफूसी से उसे डर लगता है।




उसने एक दफे स्कूल जाकर भीख में मध्याह्न् भोजन का खाना मांगकर खाया था, लेकिन बाद में वह इस अपराध-बोध से भर गई कि उसने बच्चों के हिस्से का खाना खा लिया है। ओडीसा की एक विधवा महिला शंकरी छोटे और मुलायम बांसों को पीसकर भोजन के रूप में उनका इस्तेमाल करती है। भोजन का एक अन्य स्रोत है विषैला जंगली पौधा कड्डी, जिसे वह छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर एक थैली में दबाकर दिनभर के लिए नदी में रख देती है।




कड्डी का विषैलापन बह जाता है और शंकरी के परिवार को भोजन मिल जाता है। शंकरी के लिए जून और जुलाई के महीने अच्छे बीते थे क्योंकि इस दौरान वह थोल और कुसुम के जंगली फल जुटा पाई थी, जिनके एवज में उसे चावल की चूरी और नमक मिल गए। शंकरी के बच्चों को गोश्त का स्वाद केवल बारिश के दिनों में ही मिल पाता, जब वह उनके लिए घोंघे बटोरकर लाती।




जब उसमें खेतों में काम करने की क्षमता थी, तब उसे मेहनताने के तौर पर डेढ़ किलो महुआ मिला करता था। अब जबकि उसके बच्चे बड़े हो गए हैं और वह अकेली रह गई है, उसकी तकरीबन पूरी पेंशन भात खरीदने में ही खर्च हो जाती है। और वह भी महीने भर के लिए काफी नहीं होता।




75 बरस की बूढ़ी और जर्जर उड़िया बरिहा ने छुटपन में ही छोटी माता के चलते दोनों आंखें गंवा दी थीं। १५ साल की उम्र में वह यतीम हो गई। वह कहती है, तब से अब तक तमाम उम्र जिंदगी से जूझते हुए गुजर गई, लेकिन मौत ने अभी तक दरवाजे पर दस्तक नहीं दी। उसका अधिकांश वक्त जंगलों में सूखी लकड़ियां बटोरते बीतता है।




इनमें से कुछ का उपयोग वह ईंधन के बतौर करती है और कुछ को बेच डालती है। फिर वह भात पकाती है और पानी या साग के साथ खाती है। शाम को वह गोशालाओं की सफाई करती है, जिसके बदले में उसे पका हुआ भात मिल जाता है। बीमारी या थकान के चलते जब वह काम नहीं कर पाती, तब उसके पास भीख मांगने के सिवा और कोई चारा नहीं होता।




धोनु बड़िया के भाई को १४ साल पहले जब यह पता चला कि धोनु को कुष्ठ है तो उसने उसे घर से निकाल बाहर कर दिया। तब से वह भीख मांगकर गुजारा करता रहा। ओडीसा के अकालग्रस्त जिले बोलंगीर के गांव बुरुमाल में एक छोटी-सी झोपड़ी में वह अकेले दिन गुजारता। सालों बाद स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के आग्रह पर धोनु के भाई ने उस पर तरस खाते हुए अपने घर की गोशाला के एक खुले बरामदे में उसे जगह दी। बकरियां चराने की एवज में धोनु का भाई उसे चावल की जरा सी बासी लपसी खाने को देता है।




धोनु को अपने अंगुली रहित हाथों से यह भोजन खाने में खासी कठिनाई होती है। उसे सरकार से पेंशन की आस है, ताकि उससे पेट भरने को पर्याप्त, ठोस भोजन प्राप्त कर सके। उसे अपना शरीर साफ करने के लिए साबुन की भी दरकार है। धोनु के सपनों की सरहद बस इतनी ही है।

Monday, April 19, 2010

इंडियन पैसा लीग

शशि थरूर को आखिरकार जाना पड़ा। सात दिनों तक इस्तीफा देने से इनकार के बाद उनसे इस्तीफा ले लिया गया। आईपीएल-थरूर विवाद ने जो पिटारा खोला है, वह बंद नहीं हुआ। खेल और राजनीति के गहरे संबंधों के दलदल में थरूर धंस जरूर गए, पर इस दलदल में अभी कितने कुर्ते काले व दागदार होंगे, यह सामने आना बाकी है। एक सप्ताह तक संसद ठप रही और थरूर को कैबिनेट से हटाने के बाद ही शुरू हो पाई, पर क्रिकेट में राजनीति के दखल को कम करने की बजाय उस दखल को बढ़ाने की राजनीति भी शुरू हो गई है।





क्रिकेट प्रशासकों पर गाज गिरनी तय है और पैसों के इस खेल में काले धन को उजागर करना राष्ट्रहित में भी है। इतने बड़े पैमाने पर घालमेल और निवेश में पारदर्शिता का अभाव कई घोटालों को जन्म दे सकता है और समय रहते इस पर नियंत्रण आवश्यक है क्योंकि यह मामला टैक्स बचाने से लेकर काले धन के स्रोत जैसे गंभीर मामलों से जुड़ा है। पर यहां इस बात का ध्यान रखना होगा कि सारी कवायद के केंद्र में क्रिकेट को राजनीति से अलग करना होगा, न कि क्रिकेट पर राजनीतिक वर्चस्व को बढ़ावा देना।




संसद के गलियारों में प्रतिनिधियों का गुस्सा जायज है पर जो आवाजें उठ रही हैं वे क्रिकेट पर बेहतर नियंत्रण चाहती हैं, जो भारत के सबसे लोकप्रिय खेल के हित में नहीं है। कुछ वरिष्ठ सांसदों का सुझाव है कि बीसीसीआई का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए और आईपीएल को भंग कर इसे खेल मंत्रालय को सौंप दिया जाए। इस पर बहस होनी चाहिए पर देश का अनुभव कहता है कि खेल के व्यवसायीकरण से इसका फायदा ही हुआ है। जिन खेल संघों पर सरकारी नियंत्रण रहा है उनका हाल देख लें।




क्रिकेट अभी एक निजी व्यवसाय की तरह चल रहा है और इसके अप्रतिम विकास का सबसे बड़ा कारण भी वही है। जो भी कानून निजी व्यवसायों पर लागू होते हैं, वे सब उस पर लागू हों पर उसका सरकारीकरण क्रिकेट के भविष्य के लिए अच्छा नहीं। सरकार इस खेल से जितना दूर रहे उतना बेहतर है।

खेल के व्यवसायीकरण का हौआ खड़ा कर कुछ राजनीतिक लोग क्रिकेट की भलाई कम बल्कि उसकी कमाई में अपना हिस्सा बनाने में ज्यादा रुचि रखते हैं। आशा है आईपीएल-थरूर विवाद से उपजी इस बहस का परिणाम देश में क्रिकेट प्रबंधन की दिशा और दशा सुधारेगा, पर यह भी सच है कि सरकारी नियंत्रण समाधान नहीं।

Saturday, March 13, 2010

सचिन रिकॉर्ड तेंदुलकर

संगीत सम्राट तानसेन जब स्वर साधना करते थे तो रागों से दीपक जला दिया करते थे। उसी नगरी में आज सचिन तेंदुलकर ने ऐतिहासिक पारी खेलकर दिखा दिया कि उनकी क्रिकेट साधना का तप किसी भी रिकॉर्ड को ध्वस्त कर सकता है। सचिन को ग्वालियर का कैप्टन रुपसिंह स्टेडियम हमेशा ही भाया है लेकिन २४ फरवरी २०१० को उनके बल्ले से निकला करिश्मा तरुणाई के दिल-ओ-दिमाग पर अमिट छाप छोड़ गया।

स्टेडियम में मौजूद हजारों दर्शकों के लिए सचिन की पारी किसी सपने से कम नहीं थी। किसी को समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। हर चौके-छक्के पर वाह-वाह करते दर्शकों को अहसास ही नहीं हुआ कि क्रिकेट का यह जादूगर बॉल-दर-बॉल कब एक ऐसे रिकॉर्ड को छू गया, जो हर बल्लेबाज का सपना होता है। अब जब भी सचिन की इस महान पारी का जिक्र होगा तब इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बने हजारों दर्शक अपनी भावी पीढ़ी को फक्र के साथ साझा किया करेंगे। सचिन ने ग्वालियर में अपना पहला वन डे २१ मार्च १९९१ को दक्षिण अफ्रीका के ही खिलाफ खेला। इस मैच में वे कुछ खास नहीं कर पाए और मात्र चार रन के निजी स्कोर पर पवैलियन लौट गए, किन्तु उसके बाद खेले गए आठ मैचों में उनके बल्ले की धुन पर क्रिकेट प्रेमी जमकर नाचे। यहां खेले नौ मैचों में सचिन ने ६६.१२ के औसत से दो शतक व दो अर्धशतक की मदद से ५२९ रन बनाए हैं। एक दिवसीय क्रिकेट में बल्लेबाजी के अधिकांश रिकॉर्ड सचिन के ही नाम है। आज दोहरे शतक का कीर्तिमान बनाकर सचिन ने अपने साथ ग्वालियर का नाम भी सबसे आगे और सबसे ऊपर दर्ज करा दिया। शायद किसी शहर से अपने भावनात्मक लगाव का इजहार करने का इससे बेहतर तरीका और कोई नहीं हो सकता।
सचिन वाकई बहुत अच्छा खेले। कोई उन्हें क्रिकेट का देवता कह रहा है, तो कोई उन्हें देश का लाड़ला। लेकिन अपने समय के महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर का कहना कि मैं सचिन तेंदुलकर के पैर छून चाहता हूं, वाकई सचिन की महानता को प्रतिबिंबित करता है। उनकी महानता देखिए, मैन आफ दि मैच का पुरस्कार ग्रहण करते समय उन्होंने कहा- मेरी दो सौ रन की यह पारी देश को समर्पित है, भारतवासियों को समर्पित हैं। कैरियर में कई उतार-चढ़ाव आए लेकिन लोगों ने मुझे पलकों पर बैठाए रखा।

Saturday, February 20, 2010

एक और धमाका ..

यूं, धमाकों को अहम या कम अहम धमाका तो नहीं कहा जा सकता लेकिन शनिवार को पूना में जर्मन बेकरी के बाहर हुआ धमाका ऐसा धमाका है जिसके बड़े मायने हैं। पिछले नवंबर में असम में भी धमाके हुए थे और इसमें कोई शक नहीं कि वो भी आतंकवादियों की ही करतूत थी। इस लिहाज से पूना में हुआ धमाका गृहमंत्री चिदंबरम की रिपोर्ट कार्ड में लाल निशान के तौर पर तो नहीं देखा जा सकता, लेकिन इसके बड़े मतलब जरुर हैं।

गृहमंत्रालय ने ये कबूल किया है कि ये धमाका कोई एक्सीडेंट नहीं था, बल्कि ये आतंकवादियों का किया हुआ धमाका था। गणतंत्र दिवस के समय से ही इस तरह की खबरें फिजां में तैर रही थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने खुद कबूला था कि वो मुंबई हमलों जैसी घटनाओं के दुबारा न होने देने की गारंटी नहीं ले सकते। उसी वक्त हमारे रक्षामंत्री ए के एंटनी ने भी कुछ इसी तरह की आशंका जताई थी। पाकिस्तान लगातार मुबंई हमलों के आरोपियों के बारे में टालमटोल की नीति बरकरार रखे हुए है। भारत ने पिछले दिनों उससे समग्र वार्ता की पहल फिर से शुरु करने की पेशकश की, जिसे पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अपनी विजय के तौर पर पाक जनता के सामने परोसा। जब वार्ता की औपचारिकताएं तय की जा रही थी, ठीक उससे पहले ये धमाका हुआ है। ऐसे में ये धमाका जिस बात की ओर इशारा करता है वो ये कि वार्ता से ठीक पहले वार्ता को रोकने की कोशिश जरुर की गई है।

अहम बात ये भी है कि धमाकों का जगह और इसकी तिथि बड़े शातिराना ढंग से चुनी गई। जिस जर्मन बेकरी में धमाका हुआ और उसमें कई विदेशियों के मारे जाने की भी खबरें हैं। ये बेकरी ओशो आश्रम के नजदीक है जहां विदेशियों खासकर यूरोपियनों की खासी आदमरफ्त रहती है। ये धमाका इस ओर संकेत करता है कि इस धमाके के तार आतंकवाद के अंतराष्ट्रीय नेक्सस से जुड़े हो सकते हैं। ये धमाका उसी अंदाज में हुआ है जिस अंदाज में इन्डोनेशिया और मिश्र में हुए थे। अमेरिका के अफगानिस्तान और इराक में हमलों के बाद अंतराष्ट्रीय इस्लामिक आतंकवाद का निशाना अमेरिकी और यूरोपीयन देशों के नागरिक होते रहे हैं। ये बात ओसामा बिन लादेन के कई कथित टेपों से जाहिर होती रही है। ऐसे में एक ही साथ इस धमाके से कई निशाना साधने की कोशिश की गई है। इतिहास के इस नाजुक मोड़ पर हिंदुस्तान दुर्भाग्य से अमेरिका-नीत पश्चिमी देशों की करतूतों का फल भी भुगतने पर मजबूर हो रहा है। असली चिंता यहां से शुरु होती है।

दूसरी अहम बात इस धमाकों के टाईमिंग को लेकर है। एक ऐसे वक्त में जब महाराष्ट्र समेत पूरा देश ठाकरे परिवार की गुंडागर्दी को जबर्दस्ती झेलने और सहने के लिए मजबूर हो रहा है, बिलाशक ये वक्त धमाका करने वालों के लिए बड़ा ही मुफीद वक्त था। महाराष्ट्र की लगभग पूरी पुलिस शिवसैनिकों की गुंडागर्दी रोकने के लिए जब सिनेमाघरों के आसपास तैनात हो तो फिर क्या फर्क पड़ता है कि आपने एनएसजी के कितने हब मुल्क में बना लिए। ये ऐसा मुफीद वक्त है जिसे शिवसेना जैसी पार्टियों के रहते हमारे मुल्क के दुश्मन बार-बार पाएंगे और धमाके करते रहेंगे।

बड़ा सवाल अब ये है कि इन धमाकों से भारत-पाक के बीच होनेवाली संभावित वार्ता पर क्या असर पड़ेगा। तकरीबन डेढ़ साल से दोनों मुल्कों के बीच जो बातचीत ठप्प पड़ी हुई है कहीं वो तो प्रभावित नहीं हो जाएगी। अगर ऐसा हुआ तो वाकई ये आतंकवादियों के मनसूबों को पूरा करने जैसा होगा।

Wednesday, October 21, 2009

हरी हरी घास पर

चलो चलकर बैठेंगे
हरी हरी घास पर
सरदी की दोपहर की शरमाई सी
सुनहरी धूप के संग
खाएंगे गरम गरम जलेबी
और देखेंगे ढेर सारे
सपने................
बनाएंगे रेत के महल
क्या हुआ जो महल
अगले ही क्षण टूट-टूट कर
बिखर जाएगा
हम फिर बनाएंगे नया महल
भला हमें सपने देखने से
कौन रोक सकता है....
चलो चलकर बैठेंगे
हरी-हरी घास पर
और जी भर कर निकालेंगे
एक एक कर मन की सारी कुंठाएं
और खारिज करेंगे उन्हें
जो अपनी शान में खुद ही
कसीदे पढ़ने से नहीं अघाते
हरी हरी घास पर हम
भूल जाएंगे कि कल
कितना खराब गुजरा था
हम भूल जाएंगे कि
सितमगर ने कितने सितम
ढाए थे....
हम भूल जाएंगे कि
पिछली दीवाली की रात
कितनी काली थी...
बस याद रखेंगे कि
फूलझडियों की रोशनी के बीच
उसकी सूरत में कितनी
मासूमियत थी
चलो चलकर बैठेंगे
हरी हरी घास पर
और नक्सा निकालकर
ढूंढेगे कोई नया शहर
और नए मुलाकाती
क्योंकि इन मुलाकातों में ही
छीपी है...
भविष्य की कई नई
संभावनाएं...
और सुनहरे ख्वाबों की एक और
दुनिया....
चलो चलकर बैठेंगे
हरी-हरी घास पर ...

Tuesday, February 17, 2009

बहुत कुछ कहना है ...तुमसे

बहुत बातें अनकहीं रह गईं
दफ्तर से घर लौटते हुए
कहने का करते रहे अभ्यास
घर पहुंच कर बातें बदल गईं
उन बातों पर रोज़मर्रा एक चादर
चढ़ती चली गई, परतें मोटी हो गईं
कोई हवा आएगी एक दिन जब
उड़ा ले जाएगी उन चादरों को
बहुत सी बातें वहीं दबीं मिलेंगी
तब तुम पढ़ लेना, तफ्सील से
बहुत कुछ कहने की चाहत में
क्यों मैं हर दिन तरसता हुआ...
बातें बदलता रहता हूं तुमसे
बात चौदह फ़रवरी की नहीं है
बात है साल के उन हर दिनों की
कुछ कहने का अभ्यास करता हुआ
दफ्तर से जब भी घर आता हूं
बातें बदल जाती हैं तुमसे मिलके।

Sunday, February 15, 2009

नज़रिए की ज़रूरत........

उसकी उम्र होगी यही कोई 6 साल या उससे भी कुछ कम। एक मैली-सी फटी हुई फ़्रॉक पहनी हुई, नंगे पैर, धूप में सिग्नल पर रूक रही गाड़ियों के बीच इधर-उधर भाग रही थी वो। हाथों में अंग्रेजी मैग्ज़ीन की कुछ प्रतियाँ पकड़े हुए। मैग्ज़ीन को दिखा-दिखाकर वो कह रही थी खरीद लो सा'ब अच्छी है। मैग्ज़ीन पर जलते हुए जम्मू की तस्वीर थी और लिखा हुआ था - "We need a new way to look at the problems..."
वो मैग्ज़ीन की कवर स्टोरी थी। जो शायद ये सोचने के लिए कह रही थी, कि देश की परेशानियों को देखने के लिए हमें ज़रूरत है एक नई नज़र की। लेकिन, मुझे उस मैग्ज़ीन पर पता नहीं क्यों जलता हुआ जम्मू नहीं बल्कि फ़्रॉक पहने वो 6 साल की बच्ची दिखाई दे रही थी। जो कह रही थी - क्या आप मुझे देख पा रहे है???

Thursday, February 12, 2009

वैलेंटाइन डे .......प्यार का दिन

रातों को नींद नही आती
होठों पर उसका नाम होता है
आंखों में उसके ख्वाब होते हैं
दिल में उसका ख्याल होता है
प्यार करने वालों का
शायद यही हाल होता है
इसीलिए ----------
प्यार के लिए कोई मौसम नही होता
क्यूंकि
प्यार सिर्फ़ एक दिन में सिमटा नही होता
प्यार प्यार होता है
किसी खास दिन के लिए बंधा नही होता
प्यार करने वालों के लिए
दिन खास नही होता
प्यार करने वालों के लिए
हर दिन प्यार का दिन होता है
प्यार करने वाले दिनों के
बंधनों में नही जकडे जाते
वो तो सिर्फ़ प्यार करते हैं
प्यार में जीते और प्यार में मरते हैं
प्यार करने वाले कब
दिनों के फेर में पड़ते हैं
उनके दिन रात तो सिर्फ़
प्यार में कटते हैं
ऐसे में कौन दिनों को गिनता है
प्यार करने वाला तो सिर्फ़
प्यार के लम्हों में जीता है

Monday, February 9, 2009

वो बचपन की दोस्ती.... और आज की दोस्ती

कोई हाथ भी ना बढ़ायेगा
जो गले मिलोगे यूं तपाक से
ये नये मिजाजों का शहर है..
जरा फांसले से मिलो....
ये सही है कि आज के दौर में..कागजी दुनिया..दौड़ती-भागती जिंदगी में...जहां हम काम करते हैं...दो वक्त की रोटी के लिये जद्दोजहद करते हैं,(रोटी घर की हो या फिर फाइव स्टार में लंच डिनर)...वहां सच्चे दोस्तों की कमी है...आमतौर पर औपचारिक,पेशेवर तरीके से लोग मिलते हैं...झूठी हंसी,दोस्ती की फीकी चादर ओढ़े हुए ऐसे बहुत से लोग हमें रोज मिलते हैं...हम भी जानते हैं..वो भी जानते हैं कि ये रिश्ता..या दोस्ती महज काम निकालने या काम करने के लिये हैं..हम अपने कॉलेज के..बचपन के,मौहल्ले के उन दोस्तों को याद करते हैं...जो हमारे लिये अपने घर में डांट खाते थे...कहीं शादी में गये तो..हमारे लिये भी साइड से एक थैली में गाजर का हलवा भर लाते थे..पैसे मिलाकर पिक्चर देखना,होटल में दस-दस रूपये मिलाकर बिल चुकाने वाले...उन दोस्तों की जगह कोई कभी नहीं ले सकता...लेकिन ऐसा भी नहीं है कि समय और जगह बदलने के साथ हमें नये और भरोसमंद दोस्त नहीं मिलते...सौ की भीड़ में एक या दो लोग अब भी ऐसे निकाल आते हैं..जो पुराने दोस्तों की याद ताजा कर देते हैं...उनकी कमी को पूरा करने की कोशिश करते हैं...उन्हें गले लगाकर वही अपनापन,भरोसे और इत्मिनान का अहसास होता है...वो भी मुश्किल में साथ देते हैं..सुख-दुख में गले लगाते हैं...जरूरत बस...दोस्ती की उस नजर,उस शख्स को पहचानने ओर उस हाथ को पकड़ने की है...

Tuesday, February 3, 2009

ए. आर. रहमान हमारे दौर के आर. डी. बर्मन हैं. जब हिन्दी सिनेमा ने पंचम को खोया तो लगा था कि एक दौर ख़त्म हो गया है. उनकी आखिरी फ़िल्म का गीत ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ अपने भीतर उस दौर की तमाम खूबसूरती समेटे था तो एक दूसरे गीत ‘रूठ न जाना’ में वही शरारत थी जो आर. डी. के संगीत की ख़ास पहचान थी. लगा पंचम के संगीत की अठखेलियाँ और शरारत अब लौटकर नहीं आयेंगे. लेकिन तभी दक्षिण भारत से आई एक डब्ड फ़िल्म ‘रोज़ा’ के गीत ‘छोटी सी आशा’ ने हमें चमत्कृत कर दिया. इस गीत में वही बदमाशी और भोलापन एकसाथ मौजूद था जो हम अबतक पंचम के संगीत में सुनते आए थे. ए. आर. रहमान के साथ हमें हमारा खोया हुआ पंचम वापिस मिल गया.

मैं अपने बचपन के दिनों में रहमान के संगीत वाली हर फ़िल्म की ऑडियो कैसेट ज़िद करके ख़रीदा करता था. यह वो समय था जब हमारे घर में नया-नया टेप रिकॉर्डर आया था. हम उसमें अपनी आवाज़ें रिकॉर्ड कर सुनते थे और वो हमें किसी और की आवाज़ें लगती थीं. हम कभी भी अपनी आवाज़ नहीं पहचान पाते थे. और हम उसमें रहमान के गाने सुनते थे. मेरा दोस्त विशाल बहुत अच्छा डाँस करता था और रहमान की धुनों पर वो एक ख़ास तरह का ब्रेक डाँस करता था जो सिर्फ़ उसे ही आता था. हम दोस्त एक दूसरे के जन्मदिन का बेसब्री से इंतज़ार करते और हर जन्मदिन की पार्टी का सबसे ख़ास आइटम होता विशाल का ब्रेक डाँस. हर बार हम विशाल से कहते कि वो हमें अपना डाँस दिखाए. पहले तो वो आनाकानी करता लेकिन हमारे मनाने पर मान जाता. हम कमरे के सारे खिड़की/दरवाज़े बंद कर लेते. हमें ये बिल्कुल पसंद नहीं था कि कोई और हमें देखे. मैं टेप रिकॉर्डर ऑन करता और कमरे में रहमान का ‘हम्मा-हम्मा’ गूंजने लगता. विशाल अपना ब्रेक डाँस शुरू करता और हम बैठकर उसे निहारते. हमें लगता कि वो एकदम ‘प्रभुदेवा स्टाइल’ में डाँस करता है. हम भी उसके जैसा डाँस करना चाहते थे. कभी-कभी वो हमें भी उस ब्रेक डाँस का कोई ख़ास स्टेप सिखा देता और हम उसे सीखकर एकदम खुश हो जाते. थोड़ी ही देर में हम सारे दोस्त खड़े हो जाते और सब एकसाथ नाचने लगते. विशाल भी कहता कि जब सब एकसाथ डाँस करते हैं तो उसे सबसे ज़्यादा मज़ा आता है.


अब तो कई साल हुए विशाल से मुलाकर हुए. मैं दिल्ली आ गया हूँ लेकिन आज भी जब मैं कहीं रेडियो पर ‘हम्मा-हम्मा’ सुनता हूँ तो मेरे पाँव में थिरकन होने लगती है और उस वक़्त मुझे विशाल की बहुत याद आती है. और इसीलिए रहमान हमारे दौर के आर. डी. हैं. सबका चहेता. सबसे चहेता.

रहमान को मालूम है कि हम आधे से ज़्यादा पानी के बने हैं. पानी की आवाज़ सबसे मधुर आवाज़ होती है. इसीलिए वो बार-बार अपने गीतों में इस आवाज़ को पिरो देते हैं. ‘साथिया’ में उछालते पानी का अंदाज़ हो या ‘लगान’ में गरजते बादलों की आवाज़. ‘ताल’ में बूँद-बूँद टपकते पानी की थिरकन हो या ‘रोजा’ में बहते झरने की कलकल. रहमान की सबसे पसंदीदा धुनें सीधा प्रकृति से निकलकर आती हैं. वो नए वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल में माहिर हैं और नए गायकों को मौका देने में सबसे आगे. ‘दिल से’ के लिए उन्होंने Dobro गिटार का उपयोग किया तो ‘मुस्तफा-मुस्तफा’ गीत के लिए Blues गिटार का. अपने गीत ‘टेलीफोन-टेलीफोन’ के लिए उन्होंने अरबी वाद्य Ooud का प्रयोग किया. चित्रा, हेमा सरदेसाई, मुर्तजा, मधुश्री से लेकर नरेश aiyer और मोहित चौहान तक रहमान ने हमेशा नए और उभरते गायकों को मौका दिया है. उनका संगीत लातिन अमेरिका के संगीत को हिन्दुस्तानी संगीत से और पाश्चात्य संगीत को दक्षिण भारतीय संगीत से जोड़ता है. और उनके बहुत से गीतों पर सूफि़याना प्रभाव साफ़ नज़र आता है. ‘दिल से’ के गीतों में ये सूफि़याना प्रभाव ही था जिसने उसे रहमान का और हमारे दौर का सबसे खूबसूरत अल्बम बनाया है. ये प्रेम की तड़प को उस हद तक ले जाना है कि वो प्रार्थना में उठा हाथ बन जाए. ‘लगान’ में वे लोकसंगीत को अपनी प्रेरणा बनाते हैं और ‘घनन घनन’ तथा ‘मितवा’ में ढोल का खूब उपयोग मिलता है. ‘राधा कैसे न जले’ में लोकजीवन से जुड़ी मितकथाओं का और धुन में बांसुरी का बहुत अच्छा उपयोग है. ‘स्वदेस’ की धुन में स्वागत में बजने वाली धुनों का इस्तेमाल एकदम मौके के माफ़िक है. रहमान के लिए धुनों में नयापन कभी समस्या नहीं रहा.

एक वक्त था......

एक वक़्त था
जब हम साथ रहते थे हमेशा
घर में
स्कूल में
मैदान की धूल में।
लेकिन आज
चाह कर भी मिल नही पाते।
ना जाने तुम कहाँ हो...
पर मुझे ख़ुद की भी तो ख़बर नहीं .....
जाने क्या हुआ है
ख़ुद को खो चुका हू
ऐसे में कैसे ढूंढूं तुम्हें
कहां ढूंढूं तुम्हें ?

सोचता था पहले
की तुम बदल गये हो
या फिर मैं ख़ुद बदल गया हू
लेकिन आज
दफ़्तर से आकर एहसास हुआ
कि ग़लती हमारी नही
जीने के लिए पैसा चाहिए
सिर्फ़ दोस्ती और भावनाएँ नही
और मजबूरी में सभी बंधे हैं
आप भी और मैं भी।
जिम्मेदारियों के बहाने
हम खुद तक सिमट जाते हैं,
फिर भी खुद को दोष न दें
आओ इसके लिए वक़्त को ज़िम्मेदार कहें

Thursday, January 29, 2009

माँ ...कितनी याद आती है .

कितनी याद
आती है
मां
बार-बार
याद आती है
मां
घर छोड़कर
शहर तों आ गया
पर
बिन तेरे रह नहीं पाता
मां
याद आती हैं
तेरे हाथ की बनी
रोटियां
और
तेरा दुलार
कितना अच्छा होता
कि
गाँव में ही
मिल जाता
रोजगार
ताकि कभी
दूर
न होते
तेरी ममता कि छांव
और
प्यार।

अशोक .....

पता नही कैसे उसे मेरा
थोड़ा सा बैचैन होना प्यार लगा
क्या प्यार बचैनी का दूसरा नाम है
हम तो अपने ही ख्यालों में गुम थे
मगर कैसे उसको लगा ये प्यार है
हर आहट पर चोंक जाना तो
तुम्हें पता है मेरी पुरानी आदत है
दिन में भी ख्वाब देखना
मेरी पुरानी आदत है
हर किसी के गम को
अपना बना लेना
मेरी पुरानी आदत है
फिर उस गम को
ख़ुद महसूस करना
मेरी पुरानी आदत है
फिर कैसे तुम्हें लगा
मुझको तुमसे प्यार है
मैंने तो कभी कहा नही
तुम्हारे लिए बैचैन नही
फिर कैसे तुम्हें लगा
जैसे हर ख्वाब साकार नही होता
वैसे हर बैचैनी प्यार नही होती
मुझे अपने ख्वाबों की ताबीर न बना
मैं तो इक साया हूँ
मुझे हमसाया न बना
मैं तेरा प्यार नही ख्याल हूँ
तुम मेरा प्यार नही
सिर्फ़ अहसास है
इस हकीकत को मान ले
और इस ख्वाब को
प्यार का नाम न दे

Wednesday, January 28, 2009

कॉमर्शियल break

शरबतिया कल भूख से मर गई
मीडिया की उसपर नजर गड़ गई
अख़बार वाले आए ,आए टीवी वाले भी
दो दिनों के बाद आये मुख्यमंत्री के साले भी।

परिजनों के इन्टरव्यू लिए गए
मृतिका की तस्वीर
बिकने के लिए तैयार हो गयी
मौत की तहरीर ।

भूख से हुई मौत
कितनों की भूख मिटाएगी
मौत की ख़बर भी
कॉमशिॅयल ब्रेक के साथ दिखायी जायेगी ।

नमस्कार ,आज की टॉप स्टोरी में हम
शरबतिया की भूख से हुई मौत को दिखायेंगे
हत्या,लूट ,बलात्कार वाले आइटम
बाद में दिखाए जायेंगे ।

सात दिनों से भूखी शरबतिया के
निकल नहीं रहे थे प्राण
सूखी छाती से चिपटे बच्चे के चलते
अटकी थी शायद उसकी जान ।

आख़िर ममता पर भूख पड़ी भारी
थम गई आज शरबतिया की साँस
छाती से चिपटे बच्चे ने लेकिन
छोड़ी नही थी दूध की आस ।

खबरें अभी और भी हैं श्रीमान
जाइयेगा नहीं
मौत की ऐसी मार्मिक ख़बर
किसी और चैनल पर पाइयेगा नहीं ।

परन्तु फिलहाल हम एक
छोटा सा ब्रेक लेते हैं
आपको भी आंसू पोछने का
थोड़ा वक्त देते हैं ।

प्राइम टाइम पर
ख़बरों का सिलसिला जारी है
शरबतिया के बाद उसके
मरणासन्न बेटे की बारी है ।

बच्चा भूखा है
कुपोषण का शिकार है
दो-चार दिनों में वह भी
मरने के लिए तैयार है ।

हम उसपर अपनी नजर
जमाये हुए हैं
कुछ और कमाने की
जुगत भिड़ाये हुए हैं ।

बच्चा बच गया तो हमारी किस्मत
ख़बर बिकाऊ नहीं होगी
चौबीस घंटे के चैनल के लिए
टिकाऊ नही होगी ।

क्योंकि ख़बर तो वही है
जो बिकती है
कम से कम चौबीस घंटे तक
जरूर टिकती है ।

अर्थवाद के इस युग में
पैसा पत्रकारिता पर भारी है
लोकतंत्र के चौथे खम्भे की
कॉमशिॅयल ब्रेक लाचारी है ।

इंडिया टीवी बना राजा

इंडिया टीवी बन ही गया नंबर वन। आज तक को पटखनी दे दी। पिछले कुछ हफ्तों से लगातार उपर चढ़ रहे इंडिया टीवी ने आज तक के लिए करो या मरो की स्थिति पैदा कर दी थी लेकिन आज तक खुद को बचा नहीं पाया। इस हफ्ते इंडिया टीवी 0.6 अंक चढ़ा है तो आज तक 0.8 अंक गिरा है। इन्हीं अंकों के चढ़ाव-उतार के चलते इंडिया टीवी कुल 20.1 फीसदी मार्केट शेयर के साथ हिंदी न्यूज चैनलों में नंबर वन बन गया है और आज तक कुल 19 फीसदी की रेटिंग के साथ नंबर दो के स्थान पर खिसक आया है। स्टार न्यूज नंबर तीन की पोजीशन पर बना हुआ है लेकिन इस हफ्ते अगर किसी ने सबसे ज्यागा गेन किया है तो वो है जी न्यूज।

इस न्यूज चैनल ने 0.8 अंक जोड़ते हुए अपने लिए कुल 11.6 का आंकड़ा जुटा लिया है। आईबीएन, समय, न्यूज24, तेज और इंडिया न्यूज जैसे चैनलों ने मामूली सा नुकसान झेला हैं जबकि स्टार न्यूज, एनडीटीवी, डीडी और लाइव इंडिया ने इस हफ्ते मामूली सा फायदा उठाया है।

इस हफ्ते की रेटिंग इस तरह है-

इंडिया टीवी- 20.1 (चढ़ा 0.6), आज तक- 19.0 (गिरा 0.8), स्टार न्यूज- 14.6 (चढ़ा 0.1), जी न्यूज- 11.6 (चढ़ा 0.8), आईबीएन7- 8.5 (गिरा 0.2), समय- 6.0 (गिरा 0.2), एनडीटीवी- 5.6 (चढ़ा 0.1), न्यूज24- 4.1 (गिरा 0.5), तेज- 4.0 (गिरा 0.2), डीडी- 2.9 (चढ़ा 0.2), इंडिया न्यूज- 2.5 (गिरा 0.1), लाइव इंडिया- 1.6 (चढ़ा 0.2)

(समयावधि : 18 जनवरी 2009 से 24 जनवरी 2009, टीजी : सीएस-15

इमोशनल अत्याचार।

तौबा तेरा जलवा, तौबा तेरा प्यार। इमोशनल अत्याचार। ठेठ बिहारी टच। इमोशनल अत्याचार के इस दौर में इमोशनल होना नेशनल होना हो गया है। अनुराग की नई फिल्म देव डी का यह गाना इमोशनल अत्याचार- देवदास के नाम पर लंपट बन रहे लैलाओं और आसिफों को लाइन पर लाने का उपचार है। डी यू के दिनों में कई ऐसे यौवनबहुल युवाओं को देखा है। सेंटी हो जाते थे किसी लड़की पर, उसके बाद सेंटिमेंटल होने लगते थे रात भर। उसके आने जाने का टाइम पता किया, घर का पता और उसे नोट्स देने का इंतज़ाम। बस शुरू हो जाता था इमोशनल अत्याचार।

इमोशनल अत्याचार खुद से अपने ऊपर किया जाने वाला अत्याचार है। जहां तक मुझे लगता है। कई लोग क्लास के बाद तब तक रूकते थे जब तक वो लड़की बस से घर न चली जाए। अगर कोई लड़की कार से आ गई तो पहले से ही उसकी अमीरी को लेकर खुद पर इमोशनल अत्याचार शुरू हो जाता था। यार कहां वो..कहां..मैं। औकात में रह बेटा। बस प्रेम का दि एंड।

प्रेम की तमाम निजी अभिव्यक्तियां फिल्मों की नौटंकी से मिलती जुलती हैं। आई लभ यू बोलने से लेकर डस्टबिन में फाड़ कर फेंके गए उन तमाम ख़तों की हर अदा हम अपनी जवानी में ओरिजीनल समझ कर लुटाते रहते हैं। लेकिन ये सब आता है फिल्मों से। बहुत कम प्रेमी होते हैं जो प्रेम में ओरिजीनल होते हैं और इमोशनल अत्याचार नहीं करते।

इस बेहतरीन गाने को सुनते हुए उन तमाम लंपट हरकतों की यादें ताजा हो गईं जिसमें एक लड़का और लड़की हर दिन एक दूसरे को बिना बताये चाहते रहते हैं। जब नहीं बोल पाते तो इमोशनल अत्याचार करने लगते हैं। मुझे वो लड़की क्यों याद आ गई जिसे कोई अच्छा लगता था मगर इतना बताने से पहले वो अपने भीतर हज़ार बार अपने पिता से ज़िरह करती, अपने रिश्तेदारों के डर से कांपती हुई हर दिन सौ मौतें मरती रहती। किसी को पसंद कर उसने जो इमोशनल अत्याचार किया वो सिर्फ इमोशनल लोग समझ सकते हैं। वो लड़का क्यों याद आ गया जो झूठी पट्टी बांध कर लड़कियों के बीच नाटक करता था कि गिटार बजाते हुए उसकी उंगलियां कट गईं। पटना का साला लंपू...बाप जनम में गिटार नहीं देखा लेकिन पट्टी बांध कर सेंटियाता रहता था।

सेंटी होना एक ऐसी सेंटिमेंटल सामाजिक प्रक्रिया है जो बिहार और यूपी के लड़कों को डी यू की खूबसूरत लड़कियों की परछाई के पीछे भागने के लिए मजबूर कर देती है। उसे आते देख सिगरेट जला लेना, किताब निकाल लेना और किसी निर्मल वर्मा की तरह सोचने लगना। और नहीं मिलने पर....शराब पीना। अक्सर हम सब के आस पास ऐसे लड़के होते ही हैं जो सामने वाली लड़की के शादी के दिन शराब पीते हैं। कि वो तो अब पराई हो गई। उसके घर जाकर कहने की हिम्मत नहीं होती लेकिन शराब पीकर शादी के दिन तमाम कल्पनाओं का रचनापाठ कर सेंटिमेंटल हो जाते हैं। अनुराग ने ऐसे तमाम कार्बनकौपी देवदासों को ठिकाने पर ला दिया है।

इमोशनल हुए बिना तो हम नेशनल भी नहीं होते। सेंटिमेंटल कैसे हो जायेंगे। सेंटी और मेंटल अलग अलग प्रक्रिया है। सेंटी होने तक तो आप कुछ काबू में रहते लेकिन मेंटल होने के बाद गॉन केस हो जाते हैं। रेशनल लोग वो होते हैं जो जाकर कह देते हैं कि गोरी सुनो न..आई लभ यू....। फिर किसी पार्क में घूमते हुए, ठीक पांच बजे घर से निकलते हुए और दरियागंज के गोलचा सिनेमा में फिल्में देखते हुए नज़र आते हैं।


गाना ज़बरदस्त है। अनुराग ने फिल्माया भी खूबसूरती से है। पूरा देसी टच। पटना में एल्विस को ले आये हैं। माइकल जैक्सन से लेकर एल्विस ने पटना में पैदा न होकर जो गंवाया है उसे कोई नहीं समझ सकता। हमारे यहां ऐसी वेराइटी को टिनहईया हीरो कहते हैं। भारत देश के तमाम सेंटिमेंटल प्रेमियों को ट्रिब्यूट है यह गाना- इमोशनल अत्याचार।

Tuesday, January 27, 2009

जो बस खरीद ले एक झंडा ..........

नोएडा मोड़ पर गाड़ी रूकती है
बत्ती लाल होती है, मिनटों में हरी हो जाती है।
गाड़ी फिर आगे बढ़ जाती है, पर
मन वहीं थम जाता है।
कई चेहरे एक साथ याद आते हैं
दिन अकले रह जाता और
रात भी अकेली गुजर जाती है।
मैं उन चेहरों को याद करना चाहता हूं
जिसे नोएडा मोड़ पर देखा था।
हाथ में तिरंगा लिए छोटे बच्चे
बस वही याद रह जाता है
गणतंत्र लेकिन लगता है धनतंत्र
पतली सी शर्ट, हवा भी बहती है
लेकिन तिरंगे को लिए वो छोटा बच्चा
अपने ग्राहकों को खोज रहा है
जो बस खरीद ले एक झंडा......

Monday, January 26, 2009

गन्दी गली का कुत्ता करोड़पति

गंदी गली का कुत्ता करोड़पति




स्लम डॉग मिलेनियर - आजकल हर जगह इसी फ़िल्म के चर्चे हैं। अगर मैं सही हूँ तो इस अंग्रेजी नाम का हिन्दी होना चाहिए - गली का कुत्ता करोड़पति या फिर गंदी गली का कुत्ता करोड़पति। फ़िल्म बेहतरीन बनी है और इसे अवार्ड मिलना भी शुरु हो चुके हैं। विदेशियों से मिलनेवाले इन अवार्डों की संख्या अभी और बढ़ने की उम्मीद हैं। इस फ़िल्म को देखते हुए कइयों को ये लग सकता हैं कि मैं भी ऐसा ही एक गली का कुत्ता हूँ। लेकिन, बहुत गिने चुनों को ये भी साथ में लगेगा कि मैं करोड़पति भी हूँ। क्योंकि हमारी गलियों में कुत्ते तो बहुत हैं, लेकिन सफल कितने हैं ये पता नहीं...
इस फ़िल्म के ज़रिए ये बताया गया हैं कि कैसे गंदी बस्ती में रहनेवाला एक लड़का कौन बनेगा करोड़पति जीतकर रातों रात करोड़पति बन जाता हैं। लेकिन, मेरी सोच मुझे कही ओर ले जाती हैं। हमारे देश में यूँ रातों रात अमीर और मशहूर होने की बात बहुत पुरानी नहीं हैं। कौन बनेगा करोड़पति या फिर इंडियन आइडल जैसी बातें बस कुछ दसेक साल पुरानी ही हैं। इससे पहले यूँ रातों रात सफलता किसी को नहीं मिली। साथ ही ये इन्टेन्ट सफलता लोगों को ग्लैमर के जिलेटिन में लिपटी हुई मिलती हैं। जहाँ लोगों को देश की आवाज़ और हार्ट थ्रोब और ऐसे ही बड़े-बड़े नामों से पुकारा जाता हैं। लेकिन, टीवी से गायब हो जाने के बाद इन लोगों का क्या होता हैं कोई नहीं जानता हैं। जैसे ही सीज़न टू स्टार्ट होता हैं, नई खेप देश की आवाज़ और हार्ट थ्रोब हो जाती हैं।

वैसे भी अगर इस ग्लैमरस जिलेटिन में लिपटे कामयाब लोगों की लिस्ट तैयार की जाए तो शायद ही दो से ज्यादा लोगों के नाम याद आए। करत करत अभ्यास से जड़मति होत सुजान जैसे जुमले अब किसी को पसंद नहीं। अब तो गायक बनने के लिए आपको लुक इम्प्रोवाइज़ करना पड़ता हैं, मेक ओवर करना पड़ता हैं। अब अभ्यास कोई नहीं करना चाहता हैं। इंतज़ार का फल मीठा होता हैं। लेकिन, आज भले ही खट्टा फल मिले बस हमें जल्दी मिल जाएं। सभी होड़ में हैं इन्टेन्ट सफलता के.... अपने एक कार्यक्रम के दौरान मेरा मिलना एक ऐसे व्यक्ति से हुआ जोकि 8 बार फेल होने के बाद जज बना। इस दूध बेचनेवाले के बेटे से जब हम मिलने गए तो वो दूध बेचकर लौट रहा था। चेहरे पर एक भी शिकन नहीं थी। बातचीत के दौरान एक भी बार ये नहीं लगा कि वो फ़्रेटेशन में है। खुश मिजाज़ हंसता मुस्कुराता आदमी। बेहद खुश कि उसकी मेहनत रंग ले आई। शायद किसी दिन किसान का ये बेटा भी स्लम डॉग से उठकर देश के पीड़ितों को न्याय दिलानेवालों में से एक बन जाएगा। लेकिन, उसकी ये सफलता विशुद्ध मेहनत की कमाई होगी। ऐसी ही है रानी। जोकि अपनी माँ के साथ दिल्ली के ट्रैफ़िक सिग्नलों पर बैठकर गुब्बारे बेचती थी। लेकिन, आज वो लड़की एक गैरसरकारी संस्था के साथ मिलकर स्लम में रहने वाले बच्चों को पढ़ाती हैं। बातचीत के दौरान कभी भी उसके चेहरे पर शिकन नज़र नहीं आई। बीच में ज़रूर उसने कहा कि मैं ऐसा क्या कर रही हूँ जोकि मुझे कोई देखे। इंडियन आइडल और रोडिज़ के ज़रिए सफल और लोकप्रिय होने की चाहत रखने वाले मेरे साथी शायद ही रेखा और लोकेश से प्रेरित हो। फ़िल्म बेहतरीन हैं लेकिन वो भी कही न कही युवा वर्ग के मन में फ़ेन्टेसी लैन्ड बना देती हैं। फ़िल्म की इसमें कोई गलती भी नहीं है आखिर वो अपने आप में एक कहानी है जोकि काल्पनिक होती ही हैं। लेकिन, गूढ़ बात ये हैं कि ये कहानी असलियत से प्रेरित से। और, ये असलियत इतनी खोखली है कि वो इंसान को खुद में कुछ ऐसे निगल जाती हैं जैसे कि कोई ब्लैक होल। स्लम डॉग मिलेनियर हो या फिर फैशन, ये फ़िल्में न सिर्फ़ व्यवसायिक रूप से सफल हैं बल्कि आँखें खोलने वाली भी हैं। हालांकि पता नहीं कितनों ने फ़ैशन में प्रियंका के किरदार के कपड़े और लुक को याद रखा और कितनों ने उसके स्ट्रगल और ज़िदगी के थपेड़ों को। आखिर में
मेरी नज़रों में पटना के सुपर 30 में पढ़ाई कर आईआईटी तक पहुंचे बच्चे या फिर रेखा और लोकेश की तरह मेहनतकश स्लम डॉग ही असली मिलेनियर हैं। भले ही उन्हें पूरा जीवन लगा देने पड़े करोड़ रुपए कमाने में। लेकिन, कमाई की एक-एक पाई उनकी मेहनत की होगी बिना किसी ग्लैमरस और लीजलिजी जिलेटिन के...

Friday, January 23, 2009

बिहारियों का अपराध क्या

बिहारियों का अपराध क्या है जो असम से लेकर महाराष्ट्र तक हर जगह उन पर हमला होता है?

मदन महतो कोई संपन्न घर का नहीं है फिर भी पांच-छह साल पहले जब वह दिल्ली आया था तो आप और जाईयेगा वाली भाषा में बात करता था. लेकिन अब वह आंशिक रूप से दिल्ली वाला हो गया है. दिल्ली की एक सड़कछाप गाली "बहन के लौरे" उसने अच्छी तरह से आत्मसात कर लिया है. यह सब उसने इसलिए किया क्योंकि यहां कामकाजी वर्ग में दिल्ली और गैर-दिल्लीवाले का भेद इसी गाली वाले लहजे से पता चलता है. तो अब वह दिल्लीवाला हो गया है. हर दूसरे शब्द के साथ गाली जोड़ देता है. पक्का दिल्लीवाला लगे इसलिए आप की जगह लोगों से तू-तड़ाक में बात करता है. उसकी सांस्कृतिक चेतना लुप्त हो गयी है. उसकी भाषा भले बदल गयी हो लेकिन भाषा की मिठास वह चाहकर भी नहीं छोड़ पा रहा है. वह इतना रिफाईन्ड नहीं हो सकता क्योंकि स्कूल में ज्यादा पढ़ा नहीं है. फिर भी उसने अपनी तईं खूब कोशिश की है कि वह पूरा दिल्लीवाला बन सके.

दिल्ली में जिसको पिछड़ा घोषित करना हो तो एक शब्द बोल दीजिए. बिहारी है क्या. थोड़ा और नंगई पर उतरना हो तो साला शब्द भी जोड़ सकते हैं. और लोग जोड़ते हैं. बिहार के लोगों को अपमानित करने के लिए खुद नंगे हो जाते हैं. शायद इससे उनके तुष्ट मानस को संतुष्टि मिलती हो. और इस आक्रमणकारी मानसिकता के कारण वे अपनी मूर्खता और अयोग्यता छिपा ले जाते हैं. यह केवल बिहारी और पंजाबी या सिन्धी का खेल नहीं होता. यह एक संस्कृति का दूसरे पर हावी होने की आक्रमणकारी कला है. अगर ऐसा न हो तो पलटकर बिहार का आदमी पूछ सकता है कि तुम भी तो पाकिस्तान से भागकर आये हो? वह सिन्धी या पंजाबी समुदाय के अधिकांश लोगों के लिए भगोड़ा शब्द का इस्तेमाल कर सकता है लेकिन नहीं करता. शायद उसकी सांस्कृतिक चेतना उसे ऐसा करने से रोकती है.

इस तरह एक पतित सभ्यता जागृत चेतना पर हावी हो जाती है. मैंने देखा है कई बार बिहार के लोग मुझसे कहते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में क्या फर्क है? तो तुम हमसे अलग कहां हो? शुरू में मुझे लगता था कि ये मुझे अपने साथ क्यों जोड़ना चाहते हैं? फिर मैं प्रतिरोध करता था. तर्क देता था कि इलाहाबाद का बिहार से क्या लेना-देना. लेकिन लोग बताते हैं कि देश के कुछ हिस्सों में बनारस और आस-पास के लोगों को यूपी का बिहारी कहा जाता है. अब मैं प्रतिवाद नहीं करता. हो सकता है मेरे अंदर थोड़ी समझ आ गयी हो इसलिए मैं प्रतिवाद नहीं करता लेकिन उन लोगों को कब समझ आयेगी जिन्होंने एक क्षेत्र और कौम को ही निंदित घोषित कर दिया है?

बिहारी शब्द अरूचि क्यों पैदा करने लगा है? जबकि जहां भी बिहार के प्रवासी हैं वे उस अर्थव्यवस्था में रीढ़ की तरह अपना योगदान देते हैं. क्या रीढ़ को हटाकर हम किसी शरीर की कल्पना कर सकते हैं. जिस महाराष्ट्र में बाल ठाकरे और राज ठाकरे जैसे दोयम दर्जे के लोग नफरत की राजनीति कर रहे हैं वहां के औद्योगिक इलाकों में मैं खूब घूमा हूं. आप किसी भी एमआईडीसी में चले जाईये, जहरीले रसायनों और खतरों के बीच जो इंसान अपना खून-पसीना बहा रहा होगा वह बिहार का मजदूर होगा. यूपी के लोग थोड़े चालाक हैं इसलिए यूपी के मजदूर उस तादात में फैक्ट्रियों में काम नहीं करते. करते भी हैं तो सुपरवाईजर और वाचमैन होते हैं. लेकिन असली हाड़तोड़ मेहनत बिहार का मजदूर करता है. एमआईडीसी के आस-पास मजदूरों की बस्ती में रहता है. कल्याण की एमआईडीसी का मैंने सघन दौरा किया है और उन मजदूरों के बीच रहा हूं.

बिहारी मजदूरों का जीवन ऐसा होता है कि वे सप्ताह में एक दिन सूरज देखते हैं. बाकी के दिन सूरज निकलने से पहले फैक्ट्री के अंदर और सूरज डूबने के बाद बाहर निकलते हैं. अधिकांश केमिकल और साड़ी प्रिंटिंग की कंपनियां हैं जिसमें बिना किसी सुरक्षा उपाय के वे मजदूर 12 घंटे की शिफ्ट लगाते हैं. इसके बदले में उन्हें 120 से 150 रूपये मिलते हैं. यह उस बिहारी मजदूर की मेहनत का ही तमाशा है कि मुंबई औद्योगिक नगरी बनी इतरा रही है. इतना सस्ता लेबर शायद ही दुनिया के किसी देश में मिलता हो. यह बाल ठाकरे भी समझते हैं और राज ठाकरे भी. लेकिन इस बात को बिहार का ही राजनीतिक नेतृत्व नहीं समझ सका. उसे आज तक इस बात का अहसास नहीं हो सका कि अपने राज्य के लोगों के लिए वह सम्मानित रोजगार के अवसर कैसे पैदा कर सकें? तो फिर दोष किसका ज्यादा है? बाल ठाकरे का या लालू प्रसाद और नीतिश कुमार जैसे लोगों का जो बहुत बेशर्मी से बिहार का नेता होने का दावा करते हैं? क्या यहां की राजनीतिक चेतना का आर्थिक रूपातंरण नहीं हो सकता?