Pages

Saturday, February 20, 2010

एक और धमाका ..

यूं, धमाकों को अहम या कम अहम धमाका तो नहीं कहा जा सकता लेकिन शनिवार को पूना में जर्मन बेकरी के बाहर हुआ धमाका ऐसा धमाका है जिसके बड़े मायने हैं। पिछले नवंबर में असम में भी धमाके हुए थे और इसमें कोई शक नहीं कि वो भी आतंकवादियों की ही करतूत थी। इस लिहाज से पूना में हुआ धमाका गृहमंत्री चिदंबरम की रिपोर्ट कार्ड में लाल निशान के तौर पर तो नहीं देखा जा सकता, लेकिन इसके बड़े मतलब जरुर हैं।

गृहमंत्रालय ने ये कबूल किया है कि ये धमाका कोई एक्सीडेंट नहीं था, बल्कि ये आतंकवादियों का किया हुआ धमाका था। गणतंत्र दिवस के समय से ही इस तरह की खबरें फिजां में तैर रही थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने खुद कबूला था कि वो मुंबई हमलों जैसी घटनाओं के दुबारा न होने देने की गारंटी नहीं ले सकते। उसी वक्त हमारे रक्षामंत्री ए के एंटनी ने भी कुछ इसी तरह की आशंका जताई थी। पाकिस्तान लगातार मुबंई हमलों के आरोपियों के बारे में टालमटोल की नीति बरकरार रखे हुए है। भारत ने पिछले दिनों उससे समग्र वार्ता की पहल फिर से शुरु करने की पेशकश की, जिसे पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अपनी विजय के तौर पर पाक जनता के सामने परोसा। जब वार्ता की औपचारिकताएं तय की जा रही थी, ठीक उससे पहले ये धमाका हुआ है। ऐसे में ये धमाका जिस बात की ओर इशारा करता है वो ये कि वार्ता से ठीक पहले वार्ता को रोकने की कोशिश जरुर की गई है।

अहम बात ये भी है कि धमाकों का जगह और इसकी तिथि बड़े शातिराना ढंग से चुनी गई। जिस जर्मन बेकरी में धमाका हुआ और उसमें कई विदेशियों के मारे जाने की भी खबरें हैं। ये बेकरी ओशो आश्रम के नजदीक है जहां विदेशियों खासकर यूरोपियनों की खासी आदमरफ्त रहती है। ये धमाका इस ओर संकेत करता है कि इस धमाके के तार आतंकवाद के अंतराष्ट्रीय नेक्सस से जुड़े हो सकते हैं। ये धमाका उसी अंदाज में हुआ है जिस अंदाज में इन्डोनेशिया और मिश्र में हुए थे। अमेरिका के अफगानिस्तान और इराक में हमलों के बाद अंतराष्ट्रीय इस्लामिक आतंकवाद का निशाना अमेरिकी और यूरोपीयन देशों के नागरिक होते रहे हैं। ये बात ओसामा बिन लादेन के कई कथित टेपों से जाहिर होती रही है। ऐसे में एक ही साथ इस धमाके से कई निशाना साधने की कोशिश की गई है। इतिहास के इस नाजुक मोड़ पर हिंदुस्तान दुर्भाग्य से अमेरिका-नीत पश्चिमी देशों की करतूतों का फल भी भुगतने पर मजबूर हो रहा है। असली चिंता यहां से शुरु होती है।

दूसरी अहम बात इस धमाकों के टाईमिंग को लेकर है। एक ऐसे वक्त में जब महाराष्ट्र समेत पूरा देश ठाकरे परिवार की गुंडागर्दी को जबर्दस्ती झेलने और सहने के लिए मजबूर हो रहा है, बिलाशक ये वक्त धमाका करने वालों के लिए बड़ा ही मुफीद वक्त था। महाराष्ट्र की लगभग पूरी पुलिस शिवसैनिकों की गुंडागर्दी रोकने के लिए जब सिनेमाघरों के आसपास तैनात हो तो फिर क्या फर्क पड़ता है कि आपने एनएसजी के कितने हब मुल्क में बना लिए। ये ऐसा मुफीद वक्त है जिसे शिवसेना जैसी पार्टियों के रहते हमारे मुल्क के दुश्मन बार-बार पाएंगे और धमाके करते रहेंगे।

बड़ा सवाल अब ये है कि इन धमाकों से भारत-पाक के बीच होनेवाली संभावित वार्ता पर क्या असर पड़ेगा। तकरीबन डेढ़ साल से दोनों मुल्कों के बीच जो बातचीत ठप्प पड़ी हुई है कहीं वो तो प्रभावित नहीं हो जाएगी। अगर ऐसा हुआ तो वाकई ये आतंकवादियों के मनसूबों को पूरा करने जैसा होगा।

Wednesday, October 21, 2009

हरी हरी घास पर

चलो चलकर बैठेंगे
हरी हरी घास पर
सरदी की दोपहर की शरमाई सी
सुनहरी धूप के संग
खाएंगे गरम गरम जलेबी
और देखेंगे ढेर सारे
सपने................
बनाएंगे रेत के महल
क्या हुआ जो महल
अगले ही क्षण टूट-टूट कर
बिखर जाएगा
हम फिर बनाएंगे नया महल
भला हमें सपने देखने से
कौन रोक सकता है....
चलो चलकर बैठेंगे
हरी-हरी घास पर
और जी भर कर निकालेंगे
एक एक कर मन की सारी कुंठाएं
और खारिज करेंगे उन्हें
जो अपनी शान में खुद ही
कसीदे पढ़ने से नहीं अघाते
हरी हरी घास पर हम
भूल जाएंगे कि कल
कितना खराब गुजरा था
हम भूल जाएंगे कि
सितमगर ने कितने सितम
ढाए थे....
हम भूल जाएंगे कि
पिछली दीवाली की रात
कितनी काली थी...
बस याद रखेंगे कि
फूलझडियों की रोशनी के बीच
उसकी सूरत में कितनी
मासूमियत थी
चलो चलकर बैठेंगे
हरी हरी घास पर
और नक्सा निकालकर
ढूंढेगे कोई नया शहर
और नए मुलाकाती
क्योंकि इन मुलाकातों में ही
छीपी है...
भविष्य की कई नई
संभावनाएं...
और सुनहरे ख्वाबों की एक और
दुनिया....
चलो चलकर बैठेंगे
हरी-हरी घास पर ...

Tuesday, February 17, 2009

बहुत कुछ कहना है ...तुमसे

बहुत बातें अनकहीं रह गईं
दफ्तर से घर लौटते हुए
कहने का करते रहे अभ्यास
घर पहुंच कर बातें बदल गईं
उन बातों पर रोज़मर्रा एक चादर
चढ़ती चली गई, परतें मोटी हो गईं
कोई हवा आएगी एक दिन जब
उड़ा ले जाएगी उन चादरों को
बहुत सी बातें वहीं दबीं मिलेंगी
तब तुम पढ़ लेना, तफ्सील से
बहुत कुछ कहने की चाहत में
क्यों मैं हर दिन तरसता हुआ...
बातें बदलता रहता हूं तुमसे
बात चौदह फ़रवरी की नहीं है
बात है साल के उन हर दिनों की
कुछ कहने का अभ्यास करता हुआ
दफ्तर से जब भी घर आता हूं
बातें बदल जाती हैं तुमसे मिलके।

Sunday, February 15, 2009

नज़रिए की ज़रूरत........

उसकी उम्र होगी यही कोई 6 साल या उससे भी कुछ कम। एक मैली-सी फटी हुई फ़्रॉक पहनी हुई, नंगे पैर, धूप में सिग्नल पर रूक रही गाड़ियों के बीच इधर-उधर भाग रही थी वो। हाथों में अंग्रेजी मैग्ज़ीन की कुछ प्रतियाँ पकड़े हुए। मैग्ज़ीन को दिखा-दिखाकर वो कह रही थी खरीद लो सा'ब अच्छी है। मैग्ज़ीन पर जलते हुए जम्मू की तस्वीर थी और लिखा हुआ था - "We need a new way to look at the problems..."
वो मैग्ज़ीन की कवर स्टोरी थी। जो शायद ये सोचने के लिए कह रही थी, कि देश की परेशानियों को देखने के लिए हमें ज़रूरत है एक नई नज़र की। लेकिन, मुझे उस मैग्ज़ीन पर पता नहीं क्यों जलता हुआ जम्मू नहीं बल्कि फ़्रॉक पहने वो 6 साल की बच्ची दिखाई दे रही थी। जो कह रही थी - क्या आप मुझे देख पा रहे है???

Thursday, February 12, 2009

वैलेंटाइन डे .......प्यार का दिन

रातों को नींद नही आती
होठों पर उसका नाम होता है
आंखों में उसके ख्वाब होते हैं
दिल में उसका ख्याल होता है
प्यार करने वालों का
शायद यही हाल होता है
इसीलिए ----------
प्यार के लिए कोई मौसम नही होता
क्यूंकि
प्यार सिर्फ़ एक दिन में सिमटा नही होता
प्यार प्यार होता है
किसी खास दिन के लिए बंधा नही होता
प्यार करने वालों के लिए
दिन खास नही होता
प्यार करने वालों के लिए
हर दिन प्यार का दिन होता है
प्यार करने वाले दिनों के
बंधनों में नही जकडे जाते
वो तो सिर्फ़ प्यार करते हैं
प्यार में जीते और प्यार में मरते हैं
प्यार करने वाले कब
दिनों के फेर में पड़ते हैं
उनके दिन रात तो सिर्फ़
प्यार में कटते हैं
ऐसे में कौन दिनों को गिनता है
प्यार करने वाला तो सिर्फ़
प्यार के लम्हों में जीता है

Monday, February 9, 2009

वो बचपन की दोस्ती.... और आज की दोस्ती

कोई हाथ भी ना बढ़ायेगा
जो गले मिलोगे यूं तपाक से
ये नये मिजाजों का शहर है..
जरा फांसले से मिलो....
ये सही है कि आज के दौर में..कागजी दुनिया..दौड़ती-भागती जिंदगी में...जहां हम काम करते हैं...दो वक्त की रोटी के लिये जद्दोजहद करते हैं,(रोटी घर की हो या फिर फाइव स्टार में लंच डिनर)...वहां सच्चे दोस्तों की कमी है...आमतौर पर औपचारिक,पेशेवर तरीके से लोग मिलते हैं...झूठी हंसी,दोस्ती की फीकी चादर ओढ़े हुए ऐसे बहुत से लोग हमें रोज मिलते हैं...हम भी जानते हैं..वो भी जानते हैं कि ये रिश्ता..या दोस्ती महज काम निकालने या काम करने के लिये हैं..हम अपने कॉलेज के..बचपन के,मौहल्ले के उन दोस्तों को याद करते हैं...जो हमारे लिये अपने घर में डांट खाते थे...कहीं शादी में गये तो..हमारे लिये भी साइड से एक थैली में गाजर का हलवा भर लाते थे..पैसे मिलाकर पिक्चर देखना,होटल में दस-दस रूपये मिलाकर बिल चुकाने वाले...उन दोस्तों की जगह कोई कभी नहीं ले सकता...लेकिन ऐसा भी नहीं है कि समय और जगह बदलने के साथ हमें नये और भरोसमंद दोस्त नहीं मिलते...सौ की भीड़ में एक या दो लोग अब भी ऐसे निकाल आते हैं..जो पुराने दोस्तों की याद ताजा कर देते हैं...उनकी कमी को पूरा करने की कोशिश करते हैं...उन्हें गले लगाकर वही अपनापन,भरोसे और इत्मिनान का अहसास होता है...वो भी मुश्किल में साथ देते हैं..सुख-दुख में गले लगाते हैं...जरूरत बस...दोस्ती की उस नजर,उस शख्स को पहचानने ओर उस हाथ को पकड़ने की है...